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मंगलवार, 15 मार्च 2011

चार नवगीत: कवि नईम

नईम
[समय -01-04-1935 से  09-04-2009]
सम्पर्क- डॉ० समीरा  नईम [स्व० नईम साहब की बेटी ]
दूरभाष -09425047836
7/6 राधागंज, देवास [म० प्र०]

जिस मालवा की धरती और आकाश  में कुमार गंधर्व की लोक धुनों की स्वर लहरियां आज भी गुंजायमान है, उसी मालवा के क्षितिज पर हिन्दी के अप्रतिम कवि नईम के गीतों की इन्द्रधनुषी आभा देखते ही बनती है | नईम के गीतों / कविताओं में भी मालवा रचा-बसा है | मालवा की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत बहुत ही समृद्ध है उसी विरासत को बड़े सलीके से संजोया है इस महान कवि ने | अगर आधुनिक समय में आपको गीतों/ कविताओं में कबीर को तलाशना हो तो निः संदेह आपको ढूँढना होगा देवास को और पढ़ना होगा नईम के रचना संसार को | नईम अब हमारे बीच नहीं हैं 09 अप्रैल 2009 को उनका चोला पंच तत्व में विलीन हो गया | नईम का जन्म 01  अप्रैल 1935 को ग्राम- फतेहपुर [हटा] दमोह, म० प्र० में हुआ था | सागर विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा [हिन्दी में ऍम० ए०] ग्रहण करने के बाद अध्यापन के पेशे से जुड गये और सन 1995 में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हो गये | इस कवि की वाणी में कबीर की ठसक है कभी यह कवि कहता है-"ईद बकरीद एक बहाना है / जान तो  लोगों मेरी  जाना है", तो कभी "काशी साधे नहीं सध रही / चलो कबीरा |" नईम साहब 1959 में  कविता की दुनियां में प्रवेश कर गये थे और आखिरी साँस तक हिन्दी साहित्य खासकर गीत विधा को समृद्ध करते रहे | नईम के गीत गायिकी के लिए नहीं बल्कि गहरे भावार्थ के लिए जाने जाते हैं | यह कवि भाषा के प्रति बहुत ही सजग है | कंटेंट की ताजगी अपनी निजी शैली, जनवादी तेवर, समकालीन सोच नईम को एक प्रतिनिधि गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं | इस कवि ने कविता को हंटर की तरह व्यवस्था की पीठ पर इस्तेमाल किया है | नईम कभी झुके नहीं डरे नहीं न ही लेखन में कभी हल्के हुए ,मंच पर भी उन्ही गीतों के साथ खड़े हुए जिन्हें कागज पर धार दिये | देश की सभी उत्कृष्ट पत्र -पत्रिकाओं ने इस कवि के गीतों को प्रकाशित किया | आकाशवाणी और दूरदर्शन पर भी काव्य पाठ में हिस्सा लेते रहे | नईम सिर्फ उत्कृष्ट कवि ही नहीं थे वरन एक उत्कृष्ट काष्ठ शिल्पी भी थे ,वाग्देवी उन पर मेहरवान थीं | 1997 में मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में ग्रुप शो में नईम की कलाकृतियों का प्रदर्शन भी हुआ था | तकनीक के दौर में जब लोग चिठ्ठियों की संवेदना से दूर हो गये तब भी नईम साहब पत्रों का उत्तर बड़ी सहजता से देते थे उनके पत्रों का संग्रह प्रकाशनाधीन है | म० प्र० का दुष्यन्त सम्मान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भूषण सम्मान और मुंबई के  परिवार सम्मान से सम्मानित इस कवि की कृतियाँ ..उजाड़ में परिंदे [हाल ही में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित] पथराई आँखें ,बातों ही बातों में ,पहला दिन मेरे आषाढ़ का ,लिख सकूं तो महत्वपूर्ण गीत संकलन हैं 'गलत पते पर समय 'प्रकाशनाधीन है | नईम साहब की लाडली बेटी डॉ० समीरा नईम ने हमें बहुत ही सहज ढंग से महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराई | हम उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं | नईम के चार गीत जिसमे एक उनकी हस्तलिपि में है तथा उनके काष्ठ शिल्प की छायाकृति हम आप तक अंतर्जाल के माध्यम से पहुंचा रहे हैं: -

एक

चिट्ठी पत्री 
खतो खिताबत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?
रब्बा जाने 
सही इबादत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?

चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में 
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में 
युद्ध क्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा 
इससे बदतर 
किसी कयामत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?

हवालात-सी रातें दिन कारागारों से 
रक्षक घिरे हुए चोरों से बटमारों से 
बंद पड़ी इजलास 
जमानत के मौसम 
फिर कब आयेंगे ?

ब्याह सगाई विछोह मिलन के अवसर चूके 
फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके 
लगा अंगूठा कटवा बैठे नाम खेत से 
जीने से भी बड़ी 
शहादत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?

दो 

काशी साधे नहीं सध रही 
चलो कबीरा !
मगहर साधें |

सौदा-सुलुफ कर लिया हो तो 
उठकर अपनी 
गठरी बांधें,
इस बस्ती के बाशिंदे हम 
लेकिन सबके सब अनिवासी,
फिर चाहे राजे-रानी हों -
या हो कोई दासी,
के दिन की लकड़ी की हांड़ी?
क्योंकर इसमें खिचड़ी राधें |

राजे बेईमान वजीरा बेपेंदी के लोटे 
छाये हुए चलन में सिक्के 
बड़े ठाट से खोटे 
ठगी पिंडारी के मारे सब 
सौदागर हो गये हताहत 
चलो कबीरा !
काशी साधे नहीं सध रही 
तब मगहर ही साधें |

तीन 

मैं कहाँ जोड़ूँ,
घटाऊँ कहाँ,
कुछ तरमीम कर दूँ ?
कहाँ मुमकिन है 
की चैतू घसीटे को 
नईम कर दूँ ?

क्यों करूं ऐसा भला क्या लाजमी है 
साधते हैं शब्द केवल वाग्मी हैं 
आम कटहल 
गूलरों को भला कैसे नीम कर दूँ ?

बस की सबकी है यहाँ पर एक फितरत 
एक की भी हो  पूरी कोई हसरत 
कुछ नहीं को भी 
कहाँ से-
कथा की मैं "थीम "कर दूँ ?
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आपकी कलम से:

1. नईम की कविता में न केवल बुंदेलखंड और मालवा की मिट्टी की गंध मिलती है, बल्कि जन-जीवन में संघर्ष से जुड़े चेहरे भी उभरकर सामने आते हैं. उनमें जहां एक ओर कबीर की अक्खड़ता है, वहीं दूसरी ओर समकालीन हिन्दी कविता का तेवर और गीत को कविता से जोड़ने का गहरा उपक्रम मौजूद है. नईम भाषा के साथ खेलते भी हैं और उसे रचते भी हैं. उन्होंने हिन्दी नवगीत की पहचान को पूरी ताकत के साथ स्थापित किया है. - माहेश्वर तिवारी


2. गीत एक आदिम विधा है | सन्दर्भों के बदलने के स्वरूप हमारी जिंदगी में जो नए सम्बन्ध पनपे उसका परिणाम नवगीत है | आज की गद्यात्मक जिंदगी में नईम गद्यात्मक नवगीत लिखने वाले एक मात्र नवगीतकार थे |इसलिए उनके नवगीत गाने को नहीं बल्कि सुनने और गुनने का मन करता है | - जहीर कुरेशी


3. नईम ने नवगीत को रुमानियत की दुनियां से बाहर निकालकर उसे एंटी रोमांटिक बनाने का काम किया और अपने ढंग से छंद की सामर्थ्य को बढाया | आंचलिक और देशज शब्दों का इस तरह इस्तेमाल किया जैसे मिट्टी ही उनका गोत्र हो | मालवा में घर बसाते हुए उन्होंने एक घराना बसा लिया | - प्रभु जोशी [ कथाकार ,चित्रकार एवं पूर्व कार्यक्रम अधिशाषी दूरदर्शन केन्द्र इंदौर ]


4. नईम हिन्दी नवगीत के कबीर हैं | वैसी ही सधुक्कड़ी भाषा, वही भाव भंगिमा, वही ठेठ तेवर का ठाठ, वही कलम की लुकाठी, वही व्यवस्था को भर मुंह गाली बक लेने का रचनात्मक एवं नैतिक साहस इस कवि को ताजिंदगी नवता से जोड़ते रहे | - यश मालवीय


5. चलो चलें उस पार कबीरा / लेकर अपना झांझ मजीरा [नईम ] हिन्दी नवगीत की विकास यात्रा के अग्रणी कवि और बेहद आत्मीय नईम के भीतर सहजता-गम्भीरता हाथ थामे रहती थी | जिस समय में सब नई कविता की ओर भाग रहे थे, नईम ने उपेक्षित होती जा रही विधा गीत का हाथ थामकर उसे एक नई ऊंचाई प्रदान की | नईम के गीत लोकोन्मुखी हैं, जिनकी भाषा में बुन्देली और मालवा के शब्द बिना किसी रोक टोक के चले आते थे | सामाजिक सरोकारों से जुड़े नईम के नवगीत पाठकों के भीतर बड़ी सहजता से उतरते हैं | - प्रदीप कान्त


6. नईम जी का बहुआयामी व्यक्तित्व उनके गीतों की तरह ही आदर्शमय एवं प्रभावशाली रहा. अपने गीतों के माध्यम से वे सदैव आपसी भाईचारा एवं सामाजिक एकता को बनाये रखने की सार्थक अपील करते दिखते हैं. गीत-नवगीत के लिए जो ठाठ फकीरी भावना उनके पास थी, वह कम ही देखने को मिलती है. इस दृष्टि से उन्हें हिन्दी कविता का 'नया कबीर' कहा जा सकता है. - अवनीश सिंह चौहान

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चार 

नीचे नईम का  एक हस्तलिखित गीत और उन्हीं के द्वारा निर्मित काष्ठ कलाकृति:


                                                                                   
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14 टिप्‍पणियां:

  1. Tusharji,
    NAEEM Saheb ke geet padhkar achchha laga. Rachna kis tarah apne rachnakar ka pratibimb hoti hai yeh NAEEM saheb ke geeton ko padhkar samjha ja sakta hai. NAEEM saheb ne geet ko samkaleen kavita ke patal par poori taqat ke saath ingit kiya hai.geeton ko padhkar unse judi dher saari smmirtiyan taza ho gayin. NAEEM saheb ke geeton ko prastutkar tumne bahut achchha kaam kiya hai.
    - Maheshwar Tiwari

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  2. Sharddhey Naeem ji ke geet prasaad jaise paavan lage.
    -Yogendra Verma Vyom

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  3. कवि नीम का परिचय देने क लिए आभार । चरों नवगीत एक से एक लगे।

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  4. काशी साधे नहीं सध रही
    चलो कबीरा !
    मगहर साधें |

    उफ़ कैसा शब्द संयोजन है
    पढ़ कर दिल में एक हुक सी उठ जाती है

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  5. इस महान हस्ती से परिचय कराने का धन्यवाद !
    इनकी इतनी खुबसूरत रचनाओंसे हम शायद वंचित
    रह जाते !

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  6. नईम जी के गीत प्रकाशित करने के लिये आभार। इन्हें यहाँ देखकर प्रसन्नता हुई। पहले गीत में मुझे लगता है कि दूसरे अंतरे की तीसरी पंक्ति गुम गई है। अनुभूति में हमने ऐसे ही प्रकाशित किया था क्योंकि इसे हमने एक पत्रिका से लिया था। लगा कि पत्रिका से गलती हो गई। अब अगर आपका नईम जी के परिवार से परिचय है और मूल गीत प्राप्त हो सकता है तो एक बार सुनिश्चित कर लें कि क्या यह इसी प्रकार है या एक पंक्ति कम है। नईम जी जैसे सिद्ध रचनाकार एक पंक्ति छोड़ दें वह संभव नहीं लगता।

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  7. ह्म्म्म जितना बी रीड किया आचा लगा ! आपका दिन शुब हो
    मेरे ब्लॉग पर आये !
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  8. कवि नीम का परिचय देने क लिए आभार|

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  9. नईम साहब के परिचय के लिए आभार !

    वे एक कलाकार ह्रदय रखते हैं अच्छा लगा उन्हें समझना ! आपका यह ब्लॉग अनूठा कार्य कर रहा है !

    यह आसान नहीं है....
    समय के विपरीत चलने वाले लोग अपना नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज कराने में कामयाब होते हैं !

    साहित्य के प्रति अनुराग, लगन और सेवा के लिए, समय आपको याद रखेगा !

    हार्दिक शुभकामनायें !!

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  10. धन्यवाद भाई सतीश सक्सेना जी आप सभी लोग समय निकालकर इस ब्लॉग को पढ़कर हमारा उत्साह वर्धन कर रहे हैं इसके लिए आप सभी भाइयों बहनों का आभार

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  11. आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

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  12. नेह और अपनेपन के
    इंद्रधनुषी रंगों से सजी होली
    उमंग और उल्लास का गुलाल
    हमारे जीवनों मे उंडेल दे.

    आप को सपरिवार होली की ढेरों शुभकामनाएं.
    सादर
    डोरोथी.

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  13. रब्बा जाने
    सही इबादत के मौसम
    फिर कब आयेंगे?
    बहुत सुंदर, नईम साहेब का परिचय देने की लिए धयवाद

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