लेबल

रविवार, 6 मार्च 2011

तीन गीत: कवयित्री- पूर्णिमा वर्मन


 पूर्णिमा वर्मन 
e.mail-purnima.varman@gmail.com

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस [ मार्चपर विशेष प्रस्तुति

किसी शायर ने कहा है- "जुबां पे नाम जो आये जुबान खुशबू दे  / मैं उसको सोचूं तो सारा मकान खुशबू  दे|" आज मैं एक ऐसी अप्रवासी कवयित्री के बारे में बताने जा रहा हूँ जो किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, बल्कि उस पर लिखकर मेरी कलम का रंग चटख हो जायेगा | इस कवयित्री के कार्यों और विचारों की खुशबू बहुत दूर तक महक रही है | इस कवयित्री से न सिर्फ महिलाओं को सीख लेनी चाहिए, बल्कि पुरुषों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए | कवयित्री का नाम पूर्णिमा से शुरू होता है जिसका मकसद ही उजाला बाँटना होता है | भारत को अपनी ऐसी बेटियों पर गर्व होना चाहिए | जी हाँ अब मैं बताने जा रहा हूँ आदरणीया पूर्णिमा वर्मन जी के बारे में | हिमालय की सुरम्य घाटियों में इस कवयित्री का जन्म २७ जून १९५५ को पीलीभीत उत्तर प्रदेश में हुआ था | पहाड़  की खूबसूरत वादियों में जन्मी इस कवयित्री का लगाव प्रकृति और कला के प्रति बचपन से ही हो गया था, जो आज तक जारी है | संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर किया | पत्रकारिता और बेब डिजाइनिंग में डिप्लोमा भी हासिल किया |प्रारम्भिक दिनों में मिर्जापुर और इलाहाबाद से भी नाता रहा, साहित्य के प्रति रुझान और कविता का संस्कार यहीं से मिला | पूर्णिमा वर्मन का व्यक्तित्व बहुआयामी है; खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से इनका लगाव रहता है |पिछले २० -२५ वर्षों से लेखन, संपादन, स्वतंत्र पत्रकारिता, अध्यापन, कला, ग्राफिक डिजाइनिंग और अंतर्जाल के अनेक रास्तों से गुजरते हुए अब सयुंक्त अरब अमीरात के शारजाह शहर में इन्टरनेट पत्रिकाओं अनभूति और अभिव्यक्ति का सम्पादन कर रही हैं | पूर्णिमा वर्मन की दो प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं -पूर्वा और वक्त के साथ | हम इस कवयित्री के तीन गीत आप तक पहुंचा रहे हैं -
,,.....................................................................................................................,,

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 
,,.....................................................................................................................,,

१. हवा में घुल रहा विश्वास


हवा में घुल रहा विश्वास
कोई साथ में है

धूप के दोने
दुपहरी भेजती है
छाँह सुख की
रोटियाँ सी सेंकती है
उड़ रही डालें
महक को छोड़ती उच्छवास
कोई साथ में है

बादलों की ओढ़नी
मन ओढ़ता है
एक घुँघरू
चूड़ियों में बोलता है
नाद अनहद का छिपाए
मोक्ष का विन्यास
कोई साथ में है |



२. दिन कितने आवारा थे

दिन कितने आवारा थे
गली गली और
बस्ती बस्ती
अपने मन
इकतारा थे

माटी की
खुशबू में पलते
एक खुशी से
हर दुख छलते
बाड़ी, चौक,

गली, अमराई
हर पत्थर 

गुरुद्वारा थे
हम सूरज
भिनसारा थे


किसने बड़े
ख़्वाब देखे थे
किसने ताज
महल रेखे थे
माँ की गोद, 
पिता का साया
घर-घाटी चौबारा थे
हम घर का
उजियारा थे |



3. ...सारे मोल गये


शहरों की मारामारी में
सारे मोल गये

सत्य अहिंसा ,दया ,धर्म
अवसरवादों ने लूटे
सरकारी दावे और वादे
सारे निकले झूठे
भीड़ बहुत थी  
अवसर थे कम
जगह बनाती  

रहीं कोहनियाँ
घुटने बोल गये

सडकें, गाड़ी, महल, अटारी
सभी झूठ में फाँसे
तिकड़म लील गये 

सब खुशियाँ
भीतर रहे उदासे
बेगाने दिल की क्या जानें
अपनों से भी मन की पीड़ा
टालमटोल गये |


,,........................................................................................................................,,
आपकी कलम से: 

1. हिंदी ब्लॉग लेखन में पूर्णिमा वर्मन का नाम किसी परिचय का मुखापेक्षी नहीं है| उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छंद की कविता और विशेषकर गीत-नवगीत का मान बढ़ाया है| - यश मालवीय 


2. प्रतिकूलताओं को चुनौती मानने वाली पूर्णिमा वर्मन जी ने अपनी सशक्त लेखनी और ई-पत्रकारिता के माध्यम से हिन्दी साहित्य जगत को बहुत कुछ दिया है| उनका योगदान स्तुत्य है| - अवनीश सिंह चौहान 
,,.......................................................................................................................,,

57 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन रचनाओं के साथ पूर्णिमा जी का परिचय बहुत अच्छा लगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. डॉ० दिव्या जी आपका आभार ,आप भी एक ख्यातिलब्ध डॉ० और ब्लोगर है आपको भी महिला दिवस की बधाई तथा शुभकामनाएं |

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर | आपकी हर पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा |
    आप मेरे ब्लॉग पे भी आइये आपको अपने पसंद की कुछ रचनाये मिलेंगी
    दिनेश पारीक
    http://vangaydinesh.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. पूर्णिमा जी....आपकी रचनाएँ काफी भावनाप्रधान, सार्थक और मर्मस्पर्शी हैं...इसके लिए साधुवाद स्वीकारें...
    - डॉ. नमन दत्त, खैरागढ़.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपके इन तीन गीतों ने अनगिन रंगों की छटा पसरा दी | स्वयं को
    हल्का होकर उड़ता सा महसूस किया |

    महिला दिवस की शुभकामना |

    उत्तर देंहटाएं
  6. गीत प्रकाशित करने के लिये धन्यवाद तुषार जी, दिव्या और दिनेश आपके सुंदर शब्दों के लिये धन्यवाद। डॉ. नमन और प्रवीण पंडित जी आप लोग तो स्वयं सिद्धगीतकार हैं। नमन जी आपको अब गजल से आगे निकलकर नवगीत की दुनिया में भी कदम रखना है। प्रवीण जी इस बार पाठशाला में आपका गीत नहीं मिला प्रतीक्षा में हूँ। सबको बहुत बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  7. उत्कृष्ट प्रस्तुति है |सत्य,अहिंसा,दया,धर्म अवसरवादों ने लूटे |इस एक पंक्ति ने ही आज के पूरे परिदृश्य को उजागर कर दिया है | तीनों कवितायें हृदयग्राही हैं |साधुवाद ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. इन गीतों की खूबसूरती केवल यही नहीं ि‍क इनमें कठिन लय का सहज निर्वाह किया गया है, बल्कि इसमें भी है कि विषय के अनुरूप लय में परिवर्तन स्‍वत: ही हो गया है...कोई साथ में है ..गीत में जैसी कोमलता है वह नितांत वैयक्तिक अनुभूतियों को समेटे है तो लय भी स स स स की ध्‍वनि हृदय के संकोच भाव को व्‍यक्‍त करती है तो यही क‍वयित्री जब सामाजिक सरोकारों की बात करती हैं तो है-
    अवसर थे कम
    जगह बनाती
    रहीं कोहनियाँ
    घुटने बोल गये
    में ध्‍वनि परिवर्तन के साथ भाव परिवर्तन की सूचना दे देती हैं...एक ही समय में तीन तरह के गीतों में समान सामर्थ्‍य से निर्वाह कर पाना निश्‍चय ही कठिन था, आपने कर दिखाया है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. जिंदगानी के प्रति बेशुमार भरोसे को समेटे सुन्दर एवं सकारात्मक शिल्प. अद्भुत भावना. बधाई पुर्निमा जी को.
    पंकज झा.

    उत्तर देंहटाएं
  10. पूर्णिमा जी आपके तीनों गीत बहुत सुंदर हैं.
    'हवा में घुल रहा विश्वास-कोई साथ में है'- महादेवी वर्मा को जैसे पलक झपकने की आवाज़ में पिय के आने की आहट सुनाई देती है
    'दिन कितने आवारा थे'-बचपन के दिन याद करा गये
    '...सारे मोल गाये' -मान्यताएं बदल गयीं-सब कुछ बदल गया.

    उत्तर देंहटाएं
  11. तुषारजी, शुक्रिया कि आपने पूर्णिमाजी की तीन रचनाएं महिला दिवस के रूप में पाठकों को उपहारस्‍वरूप दीं। पूर्णिमाजी संकोची तो इतनी है कि बहुमुखी प्रतिभा की धनी होते हुए भी उसका दिखावा नहीं करतीं। अभी यमुनानगर में उपसे मिलना हुआ, बड़े ही अपनेपन से मिलीं और मेरा दिल जीत लिया।

    आपका आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  12. पूर्णिमा जी के तीनों नवगीत मन को छूने वाले हैं;जिनमें "दिन कितने आवारा थे
    गली गली और
    बस्ती बस्ती
    अपने मन
    इकतारा थे।" गीत तो बीते जीवन की मधुर स्मृतियों में पहुँचा देता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. पूर्णिमा वर्मन जी का नाम साहित्य और ब्लॉग की दुनिया में जाना पहचाना है!
    यहाँ प्रस्तुत किये गये इनके तीनों ही नवगीत बहुत सुन्दर और सशक्त
    है!
    --
    महिला दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाओं के साथ-

    केशर-क्यारी को सदा, स्नेह सुधा से सींच।
    पुरुष न होता उच्च है, नारि न होती नीच।।
    नारि न होती नीच, पुरुष की खान यही है।
    है विडम्बना फिर भी इसका मान नहीं है।।
    कह ‘मयंक’ असहाय, नारि अबला-दुखियारी।
    बिना स्नेह के सूख रही यह केशर-क्यारी।।

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत ही सुन्दर तीनों रचनाएँ खुबसूरत अहसास देखने को मिले और उनकी अभिव्यक्ति वाह वाह आपको बधाई और तुषार जी को धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  15. mahila diwas ke din..itni achhi kavita padh kar man prasann ho gaya..dhanyawaad.

    उत्तर देंहटाएं
  16. koi saath me hai geet ke bol shirshak hona chahiye thaa.
    geet achche hai

    उत्तर देंहटाएं
  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. Dr.poornimaji ke tinon hi navgeet hirdaysparshi hain.apki vilakshan rachna dharmita pramukh karak hai anubhuti ko aaj ki utkrisht chhandsik kavy ki patrika ke roop main pehchan banane ke liye.
    -Yogendra Verma "Vyom"

    उत्तर देंहटाएं
  19. पूर्णिमा जी के तीनो गीत मन भाए। हालाँकि पुराने ही है पर चिर नवीन से... धूप के दोने जैसे बर्फी के दोने और छाँह की रोटियाँ जैसे बाजरे की रोटियाँ... मज़ा गया।

    उत्तर देंहटाएं
  20. पूर्णिमा जी का प्रभावशाली परिचय अच्छा लगा !! शुभकामनायें !!

    उत्तर देंहटाएं
  21. पूर्णिमा जी के तीन गीत, तीन अलग अलग विषयों से चुनकर अवनीश जी ने अपनी सुरुचि का परिचय दिया है, गीत तो उम्दा हैं ही इस विषय में क्या कहना। पूर्णिमा जी, पाठशाला में आपकी रचना की प्रतीक्षा है इस बार।

    उत्तर देंहटाएं
  22. पूर्णिमा वर्मन के तीनो नवगीत बहुत सुन्दर हैं।
    " भीड़ बहुत थी
    अवसर थे कम
    जगह बनाती
    रहीं कोहनियाँ
    घुटने बोल गये "

    पंक्तियों के क्या कहने......
    संघर्षरत नवपीढ़ी का सारा दर्द उभर आया है ........ ।

    डा० जगदीश व्योम

    उत्तर देंहटाएं
  23. पूर्णिमा वर्मन के तीनो नवगीत बहुत सुन्दर हैं।
    " भीड़ बहुत थी
    अवसर थे कम
    जगह बनाती
    रहीं कोहनियाँ
    घुटने बोल गये "

    पंक्तियों के क्या कहने......
    संघर्षरत नवपीढ़ी का सारा दर्द उभर आया है ........ ।

    -डा० जगदीश व्योम

    उत्तर देंहटाएं
  24. छंद मुक्त कविता अपनी जगह है पर कविता में लय मानीखेज हो तो उसका कोई सानी नहीं . पूर्णिमा वर्मन के ये छोटे छोटे टुकड़े बेहद कोमल भावों को साकार करते हैं , साथ ही बारीकी से प्रहार भी करते हैं .
    भीड़ बहुत थी
    अवसर थे कम
    जगह बनाती
    रहीं कोहनियाँ
    घुटने बोल गये !
    ऐसे सधे हुए नवगीत के लिए पूर्णिमा जी को और सुनहरी कलम को बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  25. पूर्णिमा जी के तीनों नवगीत मन मोह गए |

    बड़ी सहजता-सरलता और लयबद्धता से सजे -संवरे .....जीवन के छुए-अनछुए क्षणों को जीवंत करते |

    उत्तर देंहटाएं
  26. पूर्णिमा जी से परिचय कराने एवं आपकी रचनाओं की प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  27. भई मुझे तो ये पंक्तियाँ सबसे ज्यादा पसंद आईं
    माँ की गोद,
    पिता का साया
    घर-घाटी चौबारा थे
    हम घर का
    उजियारा थे
    अब इससे ज्यादा खुशनसीबी किसी के जीवन में क्या हो सकती है। परम आनंद की प्रतीति हुई। बधाई ऐसे लाजवाब शब्दों के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  28. तुषार जी
    नमस्कार.
    'दीदी'का परिचय चिटठा जगत के नवागंतुकों के लिए निःसंदेह लाभदायी सिद्ध होगा.
    हिंदी रंगमंच, हिंदी भाषा,हिंदी अंतरजाल और हिंदी साहित्य के लिए सम्पूर्ण शक्ति एवं सामर्थ्य से कृत संकल्पित आदरणीया पूर्णिमा जी को न जानने का आशय यही होगा कि हमने हिंदी साहित्य को बदलते परिवेश में पढ़ा ही नहीं है.
    ----

    प्रकृति से जुड़कर ही प्रकृति में पनपते विश्वास का अनुभव किया जा सकता है. 'धूप के दोने दुपहरी भेजती है' या फिर 'बादलों की ओढ़नी मन ओढ़ता है'
    तब ही " हवा में घुल रहा विश्वास " के लिए आशान्वित हुआ जा सकता है.
    ----
    बीती स्मृतियों पर आधारित दूसरी रचना " दिन कितने आवारा थे " में मन को इकतारा का रूप देना, माँ की गोद तथा पिता के साए को "घर-घाटी-चौबारा" कह कर उनका मान बढ़ाना निश्चित तौर पर सार्थक चिंतन है.
    ------

    अपनत्व-भाईचारे को पीछे छोड़ शहरीकरण के दुष्परिणामों और तथाकथित विकास की पोल खोलती रचना "सारे मोल गये" सच में नैतिक अवमूल्यन की दर्पण सी प्रतीत हुई.
    --------
    तुषार जी का आभार कि उन्होंने अपने ब्लॉग के माध्यम से हम सबको पूर्णिमा जी को पढने का अवसर दिया.
    पूर्णिमा जी से ऐसी ही और रचनाओं की अपेक्षा के साथ ----
    - विजय तिवारी 'किसलय' , जबलपुर म.प्र.

    उत्तर देंहटाएं
  29. sachh men kavi ki koi seemaa nahi hoti...purnimaa ji hindi ki ek anmol moti hain....unhe bahut sadhuvaad...

    उत्तर देंहटाएं
  30. बहुत अच्छी कवितायेँ ...
    पूर्णिमा जी को पहले भी पत्र - पत्रिकाओं में पढ़ चुकी हूँ ...
    बहुत अच्छा लिखती हैं ....
    बधाई उन्हें इस सम्मान के लिए ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  31. पूर्णिमा जी हिन्दी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर हैं...उनके नवगीत पढ़ना सुखद लगा।

    पूर्णिमा जी के नवगीतों की प्रस्‍तुति के लिये आपको हार्दिक धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  32. बड़ा ही सुखद आश्चर्य है कि सुनहरी कलम के पाठकों की संख्या इतनी बड़ी है और इतने लोग इसमें अपने विचार लिखना पसंद करते हैं। अनुराग पांडे, जय, सुनील कुमार, सतीश सक्सेना, सुरेन्द्र सिंह, सदा, जयंत, चिंतामणि से पहली बार परिचय हो रहा है। रचनाएँ पसंद करने के लिये धन्यवाद स्वीकारें। अपने अपने विषय के विशेषज्ञ माया मृग, शारदा मोंगा, मधु, त्र्यंबक शर्मा, सुरुचि, सुधा जी और हरकीरत हीर हिंदी साहित्य, संस्कृति और कला के जाने माने हस्ताक्षर हैं आपने रचना को पसंद किया, हार्दिक आभार। रामेश्वर कांबोज हिमांशु, रूपचंद्र शास्त्री मयंक, कमलेश कुमार दीवान, योगेन्द्र वर्मा, मुक्ता, विजय किसलय और शारदा सिंह नवगीत के सफल हस्ताक्षर है आपकी टिप्पणी मेरा सौभाग्य है। आशा है यह स्नेह भविष्य में भी बना रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  33. किसने बड़े
    ख़्वाब देखे थे
    किसने ताज
    महल रेखे थे
    माँ की गोद,
    पिता का साया
    घर-घाटी चौबारा थे
    हम घर का
    उजियारा थे |

    वाह,
    गीत ग़ज़ल से जुड़ाव महसूस करने वाला नेट उपभोक्ता ऐसा कौन है जो पूर्णिमा जी को नहीं जनता

    राणा जी और गौतम राजरिशी जी अक्सर आपकी प्रशंसा करते हैं

    मै भी सोचता हूँ नवगीत लिखूं

    उत्तर देंहटाएं
  34. पूर्णिमा जी के नवगीत प्रेमियों और मेरे ब्लॉग पर आकर साहित्यिक कविताओं को पढ़कर मेरा उत्साह वर्धन करने वाले मित्रों शुभचिंतकों आप सभी को होली की रंगबिरंगी शुभकामनाएं |

    उत्तर देंहटाएं
  35. पूर्णिमा जी का नाम जरुर सुना पर उनकी रचनाये
    आज पहली बार पढ़ रही हूँ !
    तुषार जी आपका बहुत बहुत आभार
    मेरे ब्लॉग पर आपका आना देखिये ना
    कितना सार्थक हुआ मेरे लिए !
    होली की अनेक शुभकामनये !

    उत्तर देंहटाएं
  36. पूर्णिमा जी
    तीनों हृदयग्राही उत्कृष्ट रचनायें हैं। आपने एकसाथ तीन रंगों से भिगो दिया। ये पंक्तियॉं तो अंदर तक चली गईं -
    अपनों से भी मन की पीड़ा टालमटोल गये |
    बहुत बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  37. आपके सुंदर शब्दों के हार्दिक आभार मथुरा जी, सुमन जी।

    उत्तर देंहटाएं
  38. स्तरीय नवगीत और भावपूर्ण लेखन के लिए बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  39. हमारे प्राचीन ग्रन्थ में भी कविता की परिभाषा यह कहकर दी गयी है कि- " वाक्यं रसात्मकं काव्यं " अर्थात रसों से सरावोर वाक्य हीं काव्य है !नवगीत ऐसे ही काव्य का एक परिस्कृत रूप है ! सर्जक के मानस-जगत में उत्थित भाव और विचारों की इन्द्रियानुभूति विंबों में सफल अभिव्यक्ति ही नवगीत है ।
    कहा भी गया है कि जब कोई सर्जक वस्तु जगत में स्थित किसी भाव, घटना या तत्त्व से संवेदित होता है तो वह उसे अपनी समर्थ काव्य भाषा द्वारा सहृदय तक संप्रेषित करने का उपक्रम करता है । वह आपने अभिप्रेत भाव को तद्भव रूप में संप्रेषित करने के लिए अपने सृजन क्षण में, शब्दों की सामर्थ्य एवं सीमा का शूक्ष्म संधान कर उसे प्रयुक्त करता है । जिस काव्य में हमारे समय के महत्वपूर्ण सरोकारों, सवालों से टकराती एक विशेष रूप और गुणधर्म वाली बात परिलक्षित हो वही सही मायनों में कविता है, ऐसा मेरा मानना है !

    पूर्णिमा जी, आपने सूक्ष्म भाव को व्यक्त करने हेतु इन्द्रिय ग्राह्य शब्दों का बड़ा ही सटीक प्रयोग किया है, टूटते हुए मिथक और चटकती हुई आस्थाओं के बीच कथ्य-शिल्प और भाव तीनों ही दृष्टिकोण से श्रेष्ठ और सार्थक प्रस्तुति की है आपने । शायद ऐसे ही काव्य को महसूस कर पाश्चात्य विचारक कालरिज ने कविता को "श्रेष्ठतम शब्दों का श्रेष्ठतम क्रम" कहा होगा । आपकी अभिव्यक्ति सुन्दर ही नहीं सार्थक भी है, आपको कोटिश: बधाईयाँ !

    उत्तर देंहटाएं
  40. तीनो ही रचनाएँ बेहद खुबसूरत हैं. कोई साथ में है ने सच में किसी के साथ की याद दिला दी.

    उत्तर देंहटाएं
  41. नियति और सृजनगाथा रचनाएँ पसंद करने के लिये आभार, रवीन्द्र प्रभात जी, आपने समय निकालकर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किये आभारी हूँ। सच पूछिये तो इतना लिखने के लिये जो अध्ययनशील मेधा चाहिये वह आपके पास देखकर विस्मित और प्रसन्न हूँ। सहयात्रियों की यह सूक्ष्म संवेदनात्मक समीक्षा दृष्टि ही रचनाकार को समृद्ध करती है। सहयोग कि लिये विनम्र अभिवादन। बधाई के लिये हार्दिक आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  42. सम्मानिया पूर्णिमा जी और उनकी लेखनी के बारे में कुछ भी कहना मेरे लिए मुश्किल है. इतनी वृहद् व्यक्तित्व, कृतित्व और नवसृजन से ओत-प्रोत उनकी चमक के आगे मेरे शब्द चौंधिया जाते हैं. पूर्णिमा जी नई पीढ़ी के साहित्यकारों के लिए एक प्रेरणापुंज हैं, उनके बारे में इतना कहा जा चुका है कि अब मेरे पास वो शब्द नहीं कि मैं उनके अर्थों को छू भी पाऊँ. पूर्णिमा जी की कलम को अनुभूत कर फिर उन्ही को अभिव्यक्ति कर पाना मुझ सरीखे के लिए बेहद मुशिकि है क्योंकि उनका हर गीत, कविता, छंदबद्ध हो या छंदमुक्त, हर पंक्ति अपने साथ भावों के समंदर में ठन्डे अहसास की बूँद की तरह अपने साथ समाती और डुबोती जाती है जिसके इर्द-गिर्द जो बिम्बद्वीप का सृजन होता है उस तक पहुँच, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है, शब्दों में बाँध पाना बेहद ही कठिन है.
    हिंदी साहित्य में उनका योगदान अतुलनीय और प्रेरणादाई है. पूर्णिमा जी को नमन करते हुए श्री यश मालवीय जी, तुषार साहब और अविनाश सिंह जी का आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने पूर्णिमा जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से रूबरू करवाया. आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  43. पूर्णिमा जी आप के तीनो गीत बहुत सुंदर........
    दिन आवारा ने सालों पीछे पहुंचा दिया और सारे मोल गए
    एक दम यथार्थ चित्रण..........बहुत खूब पूर्णिमाजी........धन्यवाद् सुंदर कृतियों के लिए.......

    उत्तर देंहटाएं
  44. इतनी सुन्दर रचनाओं के लिए साधुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  45. दिन कितने आवारा थे
    गली गली और
    बस्ती बस्ती
    अपने मन
    इकतारा थे ---- पूर्णिमादी की ये पंक्तियाँ पढकर तो पुराने दिन याद आ गए...मनमोहक व्यक्तित्व, लेखन और रूप की स्वामिनी हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  46. अभिव्यक्ति का तो नियमित पाठक हूं, पूर्णिमा जी की कविताओं के बारे में आज पता ही चला। सच में पढना शुरू कीजिए तो बीच में रुक नहीं सकते। बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  47. भाई शेश्धर तेवरी की कृपा से आज यह नया ब्लॉग देखा इसमें तो जब संपादन सलाहकार यश मालवीय जी हैं तो फिर कहना ही क्या ! श्रेष्ठ कवियों की श्रेष्ठ कवितायेँ हैं. यह सब कुछ पुस्तक रूप में प्रकाशित हो कुछ ऐसा भी किया जाना चाहिए. मैं हमेशा ऐसे कार्यों के साथ हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  48. अभिव्यक्ति और अनुभूति के जरिये पूर्णिमा बर्मन को कौन नहीं जानता ? उनकी कवितायेँ बहुत गहन अनुभूति से जन्म लेती हैं इसलिए संवेदना के स्तर पर उनसे पाठक का साक्षात्कार सहज ही हो जाता है. धुप के दोने दुपहरी भेजती है.छांह सुख की रोटियां सी सेंकती है.जैसे उदगार तभी तो निकल पाते हैं. कवयित्री को बधाई
    मनमोहन सरल

    उत्तर देंहटाएं
  49. purnima ji ke geet manmohak hai sunder kamal ke bhav hai
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  50. पूर्णिमा जी आपके मनमोहक गीतों को पढ़कर मन गदगद हो गया.सुंदर भाव मन की गहराई में उतर गए. बहुत-बहुत बधाई पूर्णिमा जी.
    डॉ.मीना अग्रवाल

    उत्तर देंहटाएं
  51. पूर्णिमा जी ko abhivyakti mein padhti rahti hun... unki rachnayen dil meil chhu jaati hai..
    sundar parichya ke saath unki rachna prastuti hetu aabhar!

    उत्तर देंहटाएं
  52. पूर्णिमा जी के नाम से वाकिफ़ थी मगर उनकी रचनाएँ पहली बार पढ़ीं। बहुत सुंदर लिखती हैं खासकर "दिन कितने आवारा थे" पढ़्कर तो बचपन आँखों के आगे तैर गया । अति सुंदर ।

    उत्तर देंहटाएं
  53. सहसा आज सुनहरी कलम में पूर्णिमा बर्मन जी से ,बल्कि उनके तीन नवगीतों से रूबरू होना मेरे लिये अत्यंत सुखद है । छन्द तथा शिल्प का ऐसा बेहतर सामन्जस्य बहुत कम देखने में आता है । तीनो गीत हृदय स्पर्शी एवम् अनुभूति जन्य हैं।

    उत्तर देंहटाएं