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शनिवार, 5 मार्च 2011

कुछ दोहे: कवि डॉ० राधेश्याम शुक्ल

डॉ० राधेश्याम शुक्ल

डॉ० राधेश्याम शुक्ल हिन्दी साहित्य के अप्रतिम कवि हैं| गीत/ नवगीत/ ग़ज़ल/ दोहे/ लघुकथा और समीक्षा से हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर रहे इस कवि का जन्म २६ अक्टूबर १९४२ को ग्राम सेमरा जिला संत रविदास नगर [भदोही] उत्तर प्रदेश में हुआ था| जाट पी० जी० कॉलेज [हिसार] के हिन्दी विभाग से २००२ में सेवानिवृत्त होने के उपरांत आप कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय [आदमपुर ] में अतिथि प्रोफेसर एवं शोध निदेशक के रूप में कार्यरत हैं | डॉ० शुक्ल के बारे में हिन्दी गीतों के शिखर कवि माहेश्वर तिवारी जी कहते हैं - "श्री राधेश्याम शुक्ल एक प्रतिबद्ध कवि हैं , किसी दर्शन अथवा सोच से अपने को मुक्त रखते हुए मानवीय सरोकारों के प्रतिबद्ध कवि हैं |" पंखुरी -पंखुरी झरता गुलाब , त्रिविधा , एक बादल मन , दरपन वक्त के , जरा सी प्यास रहने दे - डॉ० राधेश्याम शुक्ल की महत्वपूर्ण काव्य कृतियाँ हैं | देश राग , कैसे बुने चदरिया साधो शीघ्र प्रकाश्य कृतियाँ हैं | कविवर, तरुण, व्यक्ति ,वस्तु और कला महत्वपूर्ण शोध ग्रन्थ हैं | तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कारों - सम्मानों से सम्मानित इस कवि की कविताएं देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं | हम यहाँ डॉ० राधेश्याम शुक्ल जी के कुछ दोहे आप तक इस ब्लॉग के माध्यम से पहुंचा रहे है:-

कुछ दोहे :

अम्मां शब्दों से परे, संज्ञा एक अनाम |
उसके आंचल में बंधे, चारो पावन धाम ||

भाभी पीली रोशनी, करती घर उजियार |
सोन चिरैया थी कभी, उड़ी न पंख पसार ||

भैया खत परदेश का, फीकी स्याही लेख
थोड़े में कहता बहुत, असमय हुआ सरेख ||

बेटी मैना दूर की, चहके करे निहाल |
वक्त हुआ लो उड़ चली, तज पीहर की डाल ||

बेटा है माँ बाप की, इच्छा का आकाश |
वक्त पड़े भूगोल है, वक्त पड़े इतिहास ||

किसी जुआघर की सुबह, या मरघट की शाम |
महानगर की जिंदगी, तुझको दूँ क्या नाम ||

इस बस्ती में है भरी, निरी जंगली आग |
मेरी हिरना प्यास तू, यहाँ न पानी मांग ||

काली आंधी का शहर, उजले-उजले लोग |
वक्त फरेबी कर रहा, छल के नए प्रयोग ||

बस्ती-बस्ती रेत है, चेहरा-चेहरा प्यास |
है पानी के नाम पर, पानी का इतिहास ||

बाट देखते दिन ढला, जंगल हुआ उदास |
रही भटकती शहर में, मृगछौनों की प्यास ||

घर-घर चिताएं तपें, गलें पसीज-पसीज |
मेहँदी के क्या मायने, क्या सावन क्या तीज ||

दोहे दरपन वक्त के, मौजूदा तकरीर |
किसी यक्ष की त्रासदी, नागमती की पीर ||

पानी रोया फूटकर लगी चतुर्दिक आग |
मछ्ली तू सोयी पड़ी, जाग पड़े तो जाग ||

लोग संगमरमर हुए, हृदय हुआ इस्पात |
बर्फ हुई संवेदना, खत्म हुई सब बात ||

तेरे प्यासे शहर की, क्या चिकनी तहजीब |
फिसला मुंह के बल गिरा, गंवई गांव गरीब ||

सहते-सहते सह गये, लोग समय की मार |
पथराये परिवेश में, किससे करें गुहार ||

धूप कड़ी छाया घनी, दोनों अब निर्मूल |
मौसम से कुछ हो गयी, कहीं खास ही भूल ||

नहीं हुई परदेश की, पूरी कभी मियाद |
अब घर चल कहती रही, मुझे वतन की याद ||

अखबारी सुबहें करें, जारी नए बयान |
फिर शिकार के वास्ते, बंधने लगे मचान ||

दरके-दरके आइने, धुआं-धुआं तस्वीर |
बुझी बुझी आँखे पढ़ें, रेत-रेत तकदीर ||

पत्नी आंगन की नदी, विरवा है घर बार |
सींच-सींच कर सूखती, ढोती रेत अपार' |


चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 



1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर और रोचक लगी | आपकी हर पोस्ट
    आप मेरे ब्लॉग पे भी आये |
    मैं अपने ब्लॉग का लिंक दे रहा हु
    http://vangaydinesh.blogspot.com/

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