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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

तीन कविताएँ: कवि हरीशचन्द्र पाण्डे


कवि -हरीश चन्द्र पाण्डे
सम्पर्क -09455623176

समकालीन हिन्दी कविता में हरीश चन्द्र पाण्डे एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। अस्सी के दशक में समकालीन कविता में जिन महत्वपूर्ण कवियों ने पहचान बनायी उसमें हरीश चन्द्र पाण्डे का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) की सुरम्य पहाड़ियों  ने हिन्दी साहित्य और देश को कई महत्वपूर्ण साहित्यकार दिये हैं जिनमें प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत, इलाचन्द्र जोशी, गौरापंत शिवानी, मनोहर श्याम जोशी, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी, पंकज बिष्ट और मृणाल पाण्डे प्रमुख हैं। बुरुंश के खूबसूरत और चटख रंगों वाली शांत और सुरम्य अल्मोड़ा घाटी में (सदी गांव द्वारा हाट) २८-१२-१९५२ को हरीश चन्द्र पाण्डे का जन्म हुआ। पाण्डे जी की स्कूली शिक्षा अल्मोड़ा और पिथौरागढ  में हुई और कामर्स में स्नातकोत्तर की शिक्षा कानपुर विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश से पूर्ण हुई। हरिशचन्द्र पाण्डे की कविताएं देश की खयातिलब्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। पाण्डे जी की कविताओं में कन्टेन्ट की ताजगी और कहन की शैली दोनों स्तरीय होते हैं। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है यथा- अंग्रेजी, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी तथा उर्दू। अब तक हरीश चन्द्र पाण्डे को सोमदत्त पुरस्कार (१९९९), केदार सम्मान (२००१), ऋतुराज सम्मान (२००४), हरिनारायण व्यास सम्मान (२००६) आदि कई महत्वपूर्ण सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। पाण्डे जी की महत्वपूर्ण काव्य कृतियां हैं - ''कुछ भी मिथ्या नहीं है'', ''एक बुरुंश कहीं खिलता है'', ''भूमिकाएं खत्म नहीं होतीं'' और 'असहमति (प्रकाशनाधीन)। स्वभाव से सहज और सौम्य व्यक्तित्व के धनी कवि हरीश चन्द्र पाण्डे सम्प्रति महालेखाकार कार्यालय इलाहाबाद में वरिष्ठ लेखाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। हम इस कवि की तीन  कविताएं अपने सभी पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं -


चित्र -गूगल से साभार 



१. अख़बार पढ़ते हुए                                           

ट्रक के नीचे आ गया एक आदमी 
वह अपने बायें चल रहा था 
एक लटका पाया गया 
कमरे के पंखे में होटल में 
वह कहीं बाहर से आया था 
एक नहीं रहा 
बिजली का नंगा तार छू जाने से 
एक औरत नहीं रही 
अपने खेत में अपने को बचाते हुए 
एक नहीं रहा 
डकैतों से अपना घर बचाते हुए 
ये कल की तारीख में 
लोगों के मारे जाने के समाचार नहीं 
कल की तारीख में 
मेरे बचकर निकल जाने के समाचार हैं |    

              
२. सूर गायक 

यह जो हवा बह रही है 
उसके गाने के पहले ऐसी  नहीं बह रही थी 
ये बात अलग है 
वह इन डोलते फूलों -पत्तियों को नहीं 
देख सकता 
.....हाँ वह नहीं देख सकता 
तब हमें क्यों लगता है ऐसा 
जब वह गहरा काला चश्मा चढ़ाये गुजरता है 
हमारे बगल से 
हमें भीतर तक देखने लगा है 
संरचना के एक बेहद अंदरूनी खेल में 
उसकी आँखों के हिस्से सिफर आया 
पर उसके गले को ज्योति मिल गयी 
वह इस ज्योति को जलाये फिरता है 
वह गाता है तो कमल दल सी खिलने लगतीं हैं दिशाएं 
कभी -कभी लगता है अगर आँखें होतीं उसकी तो 
भाव और गायन के बीच  एक व्यवधान ही होतीं 
वही,वही  लोकता है अपने एकांत में 
पतझड के सबसे पहले गिरते पत्ते की आवाज 
उसने बसंत के पहले फूल   को खिलते सुना है 
उसके कान उसके भीतर जाने के राजमार्ग हैं 
लोकगीत कहते हैं उससे 
हमे तुम्हारा कंठ चाहिए 
निर्गुण कहते हैं ,हमे 
निर्गुण अपनी अमरता दे रहे हैं उसे 
और लोकगीत अपनी उमर |

     
३. बुद्ध मुस्कराये हैं 

'लाल इमली' कहते ही 
इमली नहीं  कौधी दिमाग में 
जीभ में पानी नहीं आया 
यंग इंडिया 'कहने पर हिन्दुस्तान का बिम्ब नहीं बना 
जैसे महासागर कहने पर 
सागर उभरता है आँखों में 
जैसे स्नेहलता में जुड़ा है स्नेह 
और हिमांचल में हिम 
कम से कमतर होता जा रहा है ऐसा 
इतने निरपेक्ष विपर्यस्त कभी नहीं थे हमारे बिम्ब 
की पृथ्वी पर हो 
सबसे संहारक पल का रिहर्सल 
और कहा जाय बुद्ध मुस्कराये हैं |    



3 टिप्‍पणियां:

  1. हरीशचन्द्र पाण्डे जी की कविताएँ .....बहुत ही सुन्दर,
    पढ़ कर मन आनंदित हो गया !
    शुभकामनाएँ !

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  2. इतनी अच्छी कवितायेँ पढ़वाने के लिए बधाई. तुषार जी की टिप्पणी भी सुन्दर है. आप दोनों को बधाई.

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