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बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

तीन गीत: कवि अनूप अशेष

वरिष्ठ कवि अनूप अशेष

मध्य प्रदेश की सोंधी मिट्टी में कविता और कपास दोनों ही पुष्पित -पल्लवित होते हैं| आज हम एक ऐसे नवगीतकार से आपका परिचय करा रहे हैं जिसकी कलम से लिखी कविता में जीवन के हर रंग शामिल हैं| इस वरिष्ठ नवगीतकार का नाम है अनूप अशेष | अनूप अशेष की कविताओं /गीतों में लयात्मकता, जीवन की विसंगतियाँ/ प्रयोग का पैनापन, भाषा की सहजता और आंचलिकता सब कुछ एक साथ देखने को मिल सकते हैं | अनूप अशेष का जन्म सतना जनपद के ग्राम सोनौरा में  स्व० लाल उदय सिंह के घर 7 अप्रैल 1945 को हुआ था | हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर अनूप अशेष नवगीत के अप्रतिम कवि हैं | अनूप अशेष के गीत /नवगीत देश की सभी प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं | कृतियाँ .....लौट आयेंगे सगुन पंछी /वह मेरे गांव की हंसी थी /हम अपनी खबरों के भीतर /सफर नंगे पांव का /आदिम देहों के अरण्य में घर /चेहरा घर में हैरान [बघेली नवगीत संकलन ] नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती के कवि आदि संकलन हैं कुछ कृतियाँ प्रकाशनाधीन हैं | हम अनूप अशेष के तीन  गीत आप तक पहुंचा रहे हैं:-


चित्र गूगल से साभार 


१. किसके बूते का

पिछले डामर में 
पांव जला जूते का 
ऐसे शहर भूख का जीना 
किसके बूते का

आधे पेट खेत में रहना 
बिन छपरे का सोना
खटते हुए यही अच्छा है 
माई के घर होना
मंजी आँखों वाले घर में 
जहर निपूते का

अपने जंगल, अपने जांगर 
साँस पहाड़ी है
दिन कोदो किनकी में फूटें 
मिट्टी की हांड़ी हैं
फसल किसी की, मिट्टी तन की 
सौदा कूते  का |  

२. पूछने आया सबेरे

पूछने आया सबेरे 
गांव का चैता 
कहाँ सतना 
कहाँ दिल्ली है

दोपहर की धूप 
नींदों के बुने सपने 
उतरता-सा गिद्ध 
सूखी डाल  से अपने ,
नये कुर्ते में उगी सी दीठ 
राजधानी रेलगाड़ी-सी 
चिबिल्ली है

सह नहीं पाती सिकुड़ती 
यह गली चौपाल 
सूखने सा लगा भीतर 
लोक रस का ताल
मन सिनेमा हो रहा है अब 
आँख सडकें 
हाथ गिल्ली है |

3. पहाड़ों की कोख में

पहाड़ों की कोख में 
एक जोगिन  साँझ 
धीरे चल रही है

अनमने वातावरण में 
सूर्य का ढलना 
यहाँ पहली बार देखा 
टूटकर चलना
पत्थरों में दबी- कुचली
एक सुलगी याद 
धीरे जल रही है

झाड़ियों  की ओट अपना 
फटा पल्लू डालना 
एक तीखी सी चुभन के 
बीच होना, सालना
इस धुंधलके-सी 
किसी की छांह 
धीरे ढल रही है |



5 टिप्‍पणियां:

  1. तीनो नज़्म बहुत ही प्रभावशाली है....अंतस को झकझोरती हुई रचना.... यहाँ शेयर करने का शुक्रिया

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  2. Aapka yah Blog Bahoot Accha Bana hai. Congratulatioooooooooon.

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  3. "झाड़ियों की ओट अपना /फटा पल्लू डालना /एक तीखी सी चुभन के /बीच होना, सालना/ इस धुंधलके-सी /किसी की छांह /धीरे ढल रही है |"
    बहुत सुन्दर भाव.. तुषार जी की टिप्पणी भी सुन्दर है. आप दोनों को बधाई.

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