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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

दो गीत : कवि दिनेश सिंह

दिनेश सिंह
कथ्य- शिल्प ,सम्वेदना ,कलात्मकता ,गेयता ,रागबोध ,जनपक्षधरता , आंचलिकता और काव्य सौंदर्य सब कुछ अगर एक साथ कविता में देखना हो तो मुझे दिनेश सिंह का नाम लेने में कतई संकोच नहीं होगा |यह कवि भी बैसवारे की पवित्र मिट्टी की उपज है | जीवन भर संघर्षो से घिरे रहकर भी हिंदी कविता/ गीत  को समृद्ध करने वाला यह कवि आज कलम और कल्पना की उड़ान से प्रकृति द्वारा वंचित कर दिया गया है | दिनेश सिंह पक्षाघात के शिकार हो गये हैं | अब दिनेश की बांसुरी का स्वर उनके जीवित रहते हुए भी हम नहीं सुन सकेगें | अब यह कवि कागज पर सुनहरे शब्द नहीं उकेर सकेगा | लेकिन हमें गर्व है की दिनेश सिंह ने स्वस्थ रहते हुए जो काम हिंदी कविता/ गीत के लिए किया है वह कवि सम्मेलनों में गलेबाजी करने वाले और अपने को बड़ा गीतकार घोषित करने वाले कवि भी नहीं कर पाएंगे | अज्ञेय के नया प्रतीक  से काव्य जीवन की शुरुआत करने वाले [पहली कविता नया प्रतीक में छपी थी ] इस गीत कवि की कविताएँ/ गीत देश की सभी महत्वपूर्ण पत्र -पत्रिकओं में प्रकाशित होतीं रहीं हैं | डॉ ० शम्भुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती में दिनेश सिंह अपने बेमिसाल गीतों के साथ उपस्थित हैं | १४ सितम्बर १९४७ में ग्राम -गौरा रुपई जनपद -रायबरेली में जन्मे दिनेश सिंह के पूर्वाभास ,समर करते हुए ,टेढ़े मेढे ढाई आखर ,और मैं फिर से गाऊंगा महत्वपूर्ण संकलन हैं | दिनेश सिंह का सबसे महत्वपूर्ण काम है ..नये -पुराने  पत्रिका का सम्पादन जो छह अंकों में प्रकाशित हुआ था | यह डॉ शम्भुनाथ सिंह के बाद नवगीत में दूसरा बड़ा काम है , जो दिनेश सिंह को हमेशा जीवित रखेगा | दिनेश सिंह के दो गीत हम आप तक पहुंचा रहे हैं ........  

गूगल सर्च इंजन से साभार 

1. मैं फिर से गाऊंगा 

मैं फिर से गाऊंगा 
बचपना बुलाऊंगा 
घिसटूगा घुटनों के बल 
आंगन से चलकर 
लौट -पौट आँगन में आऊंगा
मैं फिर से गाऊंगा!

कोई आये 
सफेद हाथी पर चढकर 
मेरी तरुणाई के द्वारे
किल्कूंगा 
देखूंगा एक सूंड ,चार पांव 
वह शरीर दांत दो बगारे
मैं खुद में 
घोड़ा बन जाऊंगा 
हाथी और घोड़े के बीच 
फर्क ढूढूंगा
लेकिन मैं ढूंड कहाँ पाउँगा
मैं फिर से गाऊंगा !

पोखर में पानी है 
पानी में मछ्ली है 
मछली के होठों में प्यास है
मेरे भीतर 
कोई जिंदगी की फूल कोई 
या कोई टूटा विश्वास है
कागज की नाव 
फिर बनाऊंगा 
पोखर में नाव कहाँ जायेगी 
लेकिन कुछ दूर  तो चलाऊंगा
मैं फिर से गाऊंगा!

राजा की फुलवारी में 
घुस कर चार फूल 
लुक छिप कर तोडूंगा 
माली के हाथों पड़कर 
जाने जो गति हो 
मुठ्ठी के फूल कहाँ छोडूगा 
फूल नहीं तितलियाँ फंसा उंगा 
भागेगी जहां -जहां भागूँगा 
माली के हाथ नहीं आऊंगा
मैं फिर से गाऊंगा!
  
२. मौसम का आखिरी शिकार 

मौसम का आखिरी शिकार 
आखिर फिर होगा तो कौन
झरे फूल का जिम्मेदार 
आखिर फिर होगा तो कौन!

शाखें कह बच निकलेंगी 
फूल आप झर गये
सूरज से आँख मिलाकर 
पियराये और मर गये
सच्चाई का पैरोकार 
आखिर फिर होगा तो कौन!

जंगल में आग लगेगी 
भागेंगे सभी परिंदे
तिनकों के घोसले जलें 
गर्भ भरे बेसुध अंडे 
शेष देवदार या चिनार 
आखिर फिर होगा तो कौन!

जले हुए टेसू वन में 
तोला भर राख बचेगी
भरी -भरी सी निहारती 
जोड़ा भर आँख बचेगी
पानी में पलता अंगार 
आखिर फिर होगा तो कौन!

[मैं फिर से गाऊंगा गीत संग्रह -अनुभूति प्रकाशन इलाहबाद से साभार ]

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत-बहुत आभार आपका.. पहले आपने परम आदरणीय भदौरिया जी के गीत दिये और अब परम आदरणीय गुरुवार श्री दिनेश सिंह जी के . भदौरिया जी जहां मेरे दादा गुरु है (क्योंकि वे दिनेश सिंह जी के गुरूजी हैं) वहीं श्री दिनेश सिंह जी मेरे गुरूजी हैं. दोनों ही अपने समय के महान रचनाकार हैं. मैं अभिभूत हूँ. आपकी टिप्पणी भी लाजवाब है. स्नेहाधीन- अवनीश सिंह

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  2. मछली के होठों में प्यास है
    मेरे भीतर
    कोई जिंदगी की फूल कोई
    या कोई टूटा विश्वास है
    कागज की नाव
    फिर बनाऊंगा
    --वाह!
    बहुत ही अच्छे गीत .प्रस्तुति भी बेहद पसंद आई.
    गीत के साथ लगा चित्र भी भावानुरूप.

    आभार.

    'मिलिए रेखाओं के अप्रतिम जादूगर से '

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  3. गीत और चित्र दोनों ही लाजवाब हैं| धन्यवाद|

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  4. जले हुए टेसू वन में
    टोला भर राख बचेगी
    भरी -भरी सी निहारती
    जोड़ा भर आँख बचेगी
    पानी में पलता अंगार
    आखिर फिर होगा तो कौन!
    बहुत अच्छी पंक्तियां
    दोनों गीत अच्छे हैं...

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  5. यदि आप हिंदी और हिंदुस्तान से प्यार करते है तो आईये हिंदी को सम्मान देने के लिए उत्तर प्रदेश ब्लोगेर असोसिएसन uttarpradeshblogerassociation.blogspot.com के सदस्य बने अनुसरण करे या लेखक बन कर सहयोग करें. हमें अपनी id इ-मेल करें. indianbloger @gmail .com

    ------ हरेक हिंदी ब्लागर इसका सदस्य बन सकता है और भारतीय संविधान के खिलाफ न जाने वाली हर बात लिख सकता है । --------- किसी भी विचारधारा के प्रति प्रश्न कर सकता है बिना उसका और उसके अनुयायियों का मज़ाक़ उड़ाये । ------- मूर्खादि कहकर किसी को अपमानित करने का कोई औचित्य नहीं है । -------- जो कोई करना चाहे केवल विचारधारा की समीक्षा करे कि वह मानव जाति के लिए वर्तमान में कितनी लाभकारी है ? ----- हरेक आदमी अपने मत को सामने ला सकता है ताकि विश्व भर के लोग जान सकें कि वह मत उनके लिए कितना हितकर है ? ------- इसी के साथ यह भी एक स्थापित सत्य है कि विश्व भर में औरत आज भी तरह तरह के जुल्म का शिकार है । अपने अधिकार के लिए वह आवाज़ उठा भी रही है लेकिन उसके अधिकार जो दबाए बैठा है वह पुरुष वर्ग है । औरत मर्द की माँ भी है और बहन और बेटी भी । इस फ़ोरम के सदस्य उनके साथ विशेष शालीनता बरतें , यहाँ पर भी और यहाँ से हटकर भी । औरत का सम्मान करना उसका अधिकार भी है और हमारी परंपरा भी । जैसे आप अपने परिवार में रहते हैं ऐसे ही आप यहाँ रहें और कहें हर वह बात जिसे आप सत्य और कल्याणकारी समझते हैं सबके लिए ।

    आइये हम सब मिलकर हिंदी का सम्मान बढ़ाएं.

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  6. कमाल की गहराई है इस रचना में ....बिलकुल बच्चा बनने पर महसूस करा दिया दिनेश सिंह जी ने ! शुभकामनायें एवं आभार

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  7. मौसम का आखिरी शिकार
    आखिर फिर होगा तो कौन
    झरे फूल का जिम्मेदार
    आखिर फिर होगा तो कौन!...

    दोनों गीत लाजवाब हैं| बधाई |

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  8. दोनों गीत लाजवाब हैं, शुभकामनायें एवं आभार.....

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  9. इस सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी चिट्ठा जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  10. उत्तम प्रस्तुति...

    हिन्दी ब्लाग जगत में आपका स्वागत है, कामना है कि आप इस क्षेत्र में सर्वोच्च बुलन्दियों तक पहुंचें । आप हिन्दी के दूसरे ब्लाग्स भी देखें और अच्छा लगने पर उन्हें फालो भी करें । आप जितने अधिक ब्लाग्स को फालो करेंगे आपके अपने ब्लाग्स पर भी फालोअर्स की संख्या बढती जा सकेगी । प्राथमिक तौर पर मैं आपको मेरे ब्लाग 'नजरिया' की लिंक नीचे दे रहा हूँ आप इसके आलेख "नये ब्लाग लेखकों के लिये उपयोगी सुझाव" का अवलोकन करें और इसे फालो भी करें । आपको निश्चित रुप से अच्छे परिणाम मिलेंगे । शुभकामनाओं सहित...
    http://najariya.blogspot.com/2011/02/blog-post_18.html

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  11. मौसम का आखिरी शिकार
    आखिर फिर होगा तो कौन
    झरे फूल का जिम्मेदार
    आखिर फिर होगा तो कौन!
    बहुत सुन्दर अभिवयक्ति दिनेश सिंह जी की. इतना बड़ा रचनाकार है और अंग्रेजी वाले अनिभिज्ञ हैं. इन पर अंग्रेजी में भी कार्य होना चाहिए. तुषार जी की टिप्पणी भी सुन्दर है. आप दोनों को बधाई.

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