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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

तीन गीत: कवि डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया

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डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया 

अंग्रेजी के महान कवि कीट्स ने कविता के महत्व पर टिप्पणी करते हुए कहा था ...कविता का महान लक्ष्य है वह लोगों की चिंताओं को शांत करने और उनके विचारों को उन्नत करने का काम करे|' आज हम ऐसे ही एक महान कवि डॉ शिव बहादुर सिंह भदौरिया से आपका परिचय करायेंगे |वैसवारे (रायबरेली के आस-पास का इलाका) की मिट्टी में कई हिंदी के नामचीन कवि पैदा हुए उनमे महाकवि महाप्राण निराला, मैथिलीशरण गुप्त, शिवमंगलसिंह सुमन आदि | उसी मिट्टी की सोंधी महक की उपज है हिंदी के महान नवगीत कवि एवं शिक्षक डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया | भदौरिया जी का जन्म 15 जुलाई सन 1927 को ग्राम धन्नीपुर रायबरेली उत्तर प्रदेश में हुआ था | 'हिंदी उपन्यास सृजन और प्रक्रिया' पर कानपुर  विश्व विद्यालय ने उन्हें पी एच डी की उपाधि से अलंकृत किया था  |१९६७से १९७२ तक वैसवारा स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी प्रवक्ता से लेकर विभागाध्यक्ष तक का पद शुशोभित किये | १९८८ में कमला नेहरु स्नातकोत्तर महाविद्यालय से प्राचार्य के पद पर रहते हुए सेवा निवृत्त हुए | हिंदी कविता जब आंदोलनों के दौर से गुजर रही थी, तब गीतकारों को भी महसूस हुआ की हिंदी  गीत को प्रेयसी की जुल्फ से बाहर निकल कर गीत को यथार्थ के धरातल से जोड़ा जाय | गीत आम आदमी को भी अभिव्यक्त कर सके | यहीं से हिंदी नवगीत का विकास शुरू हुआ | डॉ भदौरिया का प्रथम संकलन 'शिन्जनी' १९५३ में प्रकाशित हुआ |ठीक एक वर्ष बाद धर्मयुग में उनका एक गीत छपा 'पुरवा जो डोल गयी' यहीं से डॉ भदौरिया को एक बेहतरीन गीतकार के रूप में स्वीकार किया जाने लगा | कानपुर  विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल डॉ  भदौरिया के अन्य संकलन हैं ..माध्यम और भी, लो इतना जो गाया, पुरवा जो डोल गयी आदि | तमाम पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित इस कवि का पूरा परिचय यहाँ दे पाना काफी मुश्किल है |ह म डॉ भदौरिया जी के दो गीत आपके साथ साझा कर रहे हैं .....
     
                                   
१. नदी का बहना मुझमें हो

मेरी कोशिश है 
कि 
नदी का बहना मुझमें हो |

तट से सटे कछार घने हों 
जगह -जगह पर घाट बनें हों 
टीलों पर मंदिर हों जिनमें 
स्वर के विविध वितान तनें हों 

भीड़ 
मूर्छनाओं का 
उठाना -गिरना मुझमें हो |

जो भी प्यास पकड़ ले कगरी 
भर ले जाये खाली गगरी 
छूकर तीर उदास न लौटें 
हिरन कि गाय कि बाघ कि बकरी 

मच्छ -मगर 
घड़ियाल सभी का रहना मुझमें हो |

मैं न रुकूं संग्रह के घर में
धार रहे मेरे तेवर में 
मेरा बदन काट  कर नहरें 
ले जाएँ पानी ऊसर में 

जहां कहीं हो 
बंजरपन का 
मरना मुझमें हो |

२. टेढ़ी चाल जमाने की

सीधी -
सादी पगडंडी पर 
टेढ़ी चाल जमाने की |

एक हकीकत मेरे आगे 
जिसकी शक्ल कसाई सी 
एक हकीकत पीछे भी है 
ब्रूटस की परछाईं सी

ऐसे में भी 
बड़ी तबीयत 
मीठे सुर में गाने की |

जिस पर चढ़ता जाता हूँ 
है पेड़ एक थर्राहट का
हाथों तक आ पहुंचा सब कुछ 
भीतर की गर्माहट का

जितना खतरा 
उतनी खुशबू 
अपने सही ठिकाने की |

३ 

बैठी है -
निर्जला उपासी 
भादों कजरी तीज पिया |

अलग -अलग 
प्रतिकूल दिशा में 
सारस के जोड़े का उड़ना |

किन्तु अभेद्य 
अनवरत लय में 
कूकों, प्रतिकूलों का का जुड़ना |

मेरा सुनना 
सुनते रहना 
ये सब क्या है चीज पिया |

क्षुब्ध हवा का 
सबके उपर 
हाथ उठाना ,पांव पटकना 

भींगे कापालिक -
पेड़ों का 
बदहवास हो बदन छिटकना |

यह सब क्यों है 
मैं क्या जानूँ 
मुझको कौन तमीज पिया |

5 टिप्‍पणियां:

  1. तुषार जी, भदौरिया जी के विषय में बहुइत अच्छी जानकारी दी.............धन्यवाद्!

    डॉ. दिव्या श्रीवास्तव ने विवाह की वर्षगाँठ के अवसर पर किया पौधारोपण
    डॉ. दिव्या श्रीवास्तव जी ने विवाह की वर्षगाँठ के अवसर पर तुलसी एवं गुलाब का रोपण किया है। उनका यह महत्त्वपूर्ण योगदान उनके प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, जागरूकता एवं समर्पण को दर्शाता है। वे एक सक्रिय ब्लॉग लेखिका, एक डॉक्टर, के साथ- साथ प्रकृति-संरक्षण के पुनीत कार्य के प्रति भी समर्पित हैं।
    “वृक्षारोपण : एक कदम प्रकृति की ओर” एवं पूरे ब्लॉग परिवार की ओर से दिव्या जी एवं समीर जीको स्वाभिमान, सुख, शान्ति, स्वास्थ्य एवं समृद्धि के पञ्चामृत से पूरित मधुर एवं प्रेममय वैवाहिक जीवन के लिये हार्दिक शुभकामनायें।

    आप भी इस पावन कार्य में अपना सहयोग दें।
    http://vriksharopan.blogspot.com/2011/02/blog-post.html

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  2. दोनों ही गीत बेहतरीन हैं . भदौरियाजी बड़े रचनाकार है. मुझे उनसे बतियाने, उनके श्रीमुख से गीत सुनने का कई बार सुअवसर मिला, दिनेश सिंह जी के माध्यम से.आपको भी साधुबाद

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  3. सीधी -/सादी पगडंडी पर/
    टेढ़ी चाल जमाने की |"
    बहुत सुन्दर भाव.. तुषार जी की टिप्पणी भी सुन्दर है. आप दोनों को बधाई.

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