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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

फागुनी दोहे :कवि कैलाश गौतम

कैलाश गौतम
                                                               


लगे फूंकने आम के, बौर गुलाबी शंख |
कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख ||

गोरी धूप कछार की ,हम सरसों के फूल |
जब -जब होंगे सामने तब -तब होगी भूल

फागुन आया गांव में गयी गांव की नींद |
आँखों में सौदे हुए होठों कटी रसीद ||

टेसू कूदे आग में ,ऐसी जागी प्यास 
दुनियां पढ़ती कोयला हम पढते मधुमास ||

बिल्ली काटे रास्ता ,तोता काटे आम |
मैं बिरहिन चढती उमर कैसे काटूं राम ||

हाथ रंगे ,आँखे रंगी ,रंगे गुलाबी गाल |
सारा पानी जल गया ,फिर भी गली न दाल ||

चांद शरद का मुंह लगा ,भगा चिकोटी काट |
घंटों सहलाती रही नदी ,महेवा घाट ||

बाँट गया दिन आज का ,हल्दी -अक्षत -पान  |
दर्पण ही दर्पण यहाँ तैर रही मुस्कान ||

झील -चांदनी कहकहे ,यह फागुन की शाम |
चार आँख के सामने ,क्या हैं चारो धाम ||

सहज सरल चितवन मधुर ,मंद मंद मुस्कान |
भीतर- भीतर  पक रहा ,जैसे मघई पान ||

आँख खुली मौसम खुला ,खुले खेत के खेत |
खुलते -खुलते रह गए ,बंधे- बंधे संकेत ||

चैत चांदनी ,यह उमर ,यह महुवे की गंध |
छाती पर पत्थर लिए, जाग रही सौगंध ||

ये बजरे की चांदनी ,ये गंगा की धार |
भीतर -भीतर टीसता ,पहला -पहला प्यार ||

जब से आया मुम्बई तब से नींद हराम |
चौपाटी तुझसे भली लोकनाथ की शाम ||

धूप सुहानी हो गयी ,खिले सुहाने फूल |
अमराई की छांह में ,चिड़ियों का स्कूल ||

नींद उडाकर ले गयी ,कोयल तेरी कूक |
मेरे ही संग क्यों भला ,इतना बुरा सुलूक ||

खिलते हुए अबीर थे ,उड़ते हुए गुलाल |
होठों से नीले पड़े ,वही गुलाबी गाल ||

वन फूले  कचनार के ,भर -भर आते नैन ,
हिरन दौड़ता रेत में ,कहीं न मिलता चैन ||

दीपक वाली देहरी, तारों वाली शाम |
आओ लिख दूँ चंद्रमा आज तुम्हारे नाम ||

खिलने लगीं चिकोटियां चढने लगा बुखार |
जिसको -जिसको छू गए फागुन के दिन चार ||
चित्र गूगल से साभार 

[बिना कान का आदमी ...दोहा संग्रह साहित्यवाणी प्रकाशन से साभार ]





8 टिप्‍पणियां:

  1. कैलाश गौतम जी का परिचय हमारे दूसरे ब्लॉग छान्दसिक अनुगायन पर उपलब्ध है |आप वहाँ देख सकते हैं |

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  2. स्व. कैलाश गौतम जी के दोहे कालजयी हैं. साहित्य समाज आपका आभारी है गौतम जी की रचनाओं को प्रस्तुत करने के लिए.

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  3. दीपक वाली देहरी, तारों वाली शाम |
    आओ लिख दूँ चंद्रमा आज तुम्हारे नाम ||

    सारे के सारे दोहे बहुत ही ख़ूबसूरत हैं....आभार उन्हें पढवाने का

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  4. वसंती रंगों से सराबोर फ़ागुनी दोहे अच्छे लगे.गौतम जी की रचनाओं से परिचय कराने के लिए आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  5. धूप सुहानी हो गयी ,खिले सुहाने फूल |
    अमराई की छांह में ,चिड़ियों का स्कूल ||
    के बदले हमने कुछ यूं पढ़ा था-
    गंगा है हरिद्वार की, ब्रजमंडल की धूल|
    हंसी तुम्‍हारी कनुप्रिया, बच्‍चों का स्‍कूल||

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  6. भाई राहुल जी बिना कान का आदमी -संग्रह में दोहा जिस रूप में था मैंने उसी रूप में रख दिया है |यह संग्रह कैलाश जी के निधन के बाद प्रकाशित हुआ है हलांकि इसका एक प्रूफ वह अपने जीवन के अंतिम समय में देख चुके थे |

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  7. kailsh ji ke dohe padhane ke liye shukriya. kailash ji hindi aur bhojpuri dono ke ustaad rahe hai kabhi fursat me unki bhojpuri rachnao ke dekhe (agar bhojpuri samjh me aati hai to :))...maja aa jayega aapko..bagvaan kaiash ji ki aatma ko shanti de

    http://bhojpuriallsongdownload.blogspot.com/2010/07/bhojpuri-poet-iv-kailash-gautam.html

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